کد خبر ۵۸۴ ۲۹۴ بازدید انتشار : ۱۱ آبان ۱۳۹۵ ساعت ۱۸:۵۶

(इमाम ह़ुसैन (अ स

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उन के असहाब कुछ दिन वहाँइ ठहरे, तब दुश्मन ने उन पर नहरे फ़ुरात का पानी बन्द कर दिया। आप का पूरा क़ाफ़िला प्यासा हो गया था। फिर एक रात इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने तमाम दोस्तों और रिश्तेदारों को रात की तारीकी में जमा किया और फ़रमाया यज़ीद को सिर्फ़ मुझ से दुश्मनी है तुम में से जो भी जाना चाहता है वह जा सकता है।

 (इमाम ह़ुसैन (अ स)

प्यारे बच्चों! इमाम हुसैन (अ स) हम शियों के तीसरे इमाम हैं, जो मदीने में पैदा हुए। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने हमेशा लोगों को अच्छे काम करने की ताकीद की और फ़रमाते थे कि उन लोगों से दूर रहो जो जुल्म और बुरे काम करते हो। इन सब बातों की वजह से यज़ीद, जो उस वक़्त का ख़लीफ़ा था और उस दौर के मुसलमानों पर जुल्म किया करता था और हर वह काम करता था जिस को इस्लाम में मना किया गया है, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का दुश्मन हो गया था।

उस ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से बैअत का सवाल किया जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने इस की बैअत से इन्कार किया तो वह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को शाहीद करने के चक्कर में पड़ गया और आप से लड़ने के लिए पूरी फ़ौज रवाना कर दी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने मजबूरन अपने नाना के शहर मदीना को अपने ख़ानदान और असहाब के साथ छोड़ दिया, ताकि वहाँ पर ख़ून ख़राबा न हो।

आप मक्के पहुँचे लेकिन वहाँ भी यज़ीद के फ़ौजी पहुँच गये जिस की वजह से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम हज नहीं कर सके और मक्के को छोड़ कर इराक़ की जानिब रवाना हो गये । क्योंकि शहर कूफ़े के लोग की तरफ़ से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पास बुहत सारे खत आने लगे थे। जिस में लिखा हुआ था कि ऐ वली ख़ुदा आप हमारी मदद को आइये, हम लोगों को यज़ीद के जुल्म व सितम से निजात दिलाइए।

जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने लोगों का इतना इसरार देखा तो कूफ़े जाने का फैसला कर लिया। और आप अलैहिस्सलाम ने पहले अपने भाई मुस्लिम को कूफ़े की तरफ़ रवाना किया। कूफ़े वालों ने पहले तो जनाब मुस्लिम का बुहत गरम जोशी से इसतेग़बाल किया और आप के हाथों पर बैअत की लेकिन बाद मे इब्ने ज़्यादा के ख़ौफ़ से जनाब मुस्लिम का साथ छोड़ दिया जिस की वजह से यज़ीदी फ़ौज ने आप को बेदर्दी से शहीद कर दिया। जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को जनाब मुस्लिम की शहादत की ख़बर मिली तो आप अलैहिस्सलाम ने कूफ़े जाने का इरादा तर्क कर दिया और दूसरी जानिब रवाना हो गये एक मकाम पर पहुँचे जिस का नाम कर्बला था।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उन के असहाब कुछ दिन वहाँ ठहरे, तब दुश्मन ने उन पर नहरे फ़ुरात का पानी बन्द कर दिया। आप का पूरा क़ाफ़िला प्यासा हो गया था। फिर एक रात इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने तमाम दोस्तों और रिश्तेदारों को रात की तारीकी में जमा किया और फ़रमाया यज़ीद को सिर्फ़ मुझ से दुश्मनी है तुम में से जो भी जाना चाहता है वह जा सकता है। लेकिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के तमाम असह़ाब और दोस्तों ने कहा नहीं मौला हम में से कोई भी आप को अकेला नहीं छोड़ेगा।

अगले दिन जो कि आशूर का दिन था जंग शुरू हो गयी। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके साथियों ने यज़ीदी फ़ौज के मुक़ाबिले दिलेराना जंग की और ख़ुदा और इस्लाम की राह में शहीद हो गये। यज़ीदी फ़ौज इस कद्र ज़ालिम थी की उन्होंने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और आप के साथियों के शहीद करने के बाद भी उन पर रहम न किया और उन तमाम शहीदों के बदन से सरों को जूदा कर के नैज़ौं पर चढ़ा दिया और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के घर वालों को क़ैदी बना कर ज़िन्दान में डाल दिया। प्यारे बच्चों हम हर साल 10 मोहर्रम को जुलूस निकालते हैं, माहे मोहर्रम और सफ़र में अज़ादारी करते हैं, सिर्फ़ इस वजह से कि जो दुश्मन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का था वह आज भी ज़िन्दा है और चाहता है लोग अच्छे काम न करें।

हम इसीलिए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की मजलिस बरपा करते हैं ताकि उन से हम ये सिखें की किस तरह़ दुश्मन का मुक़ाबिला करते हैं और अल्लाह की रज़ा हासिल करते हैं। तो प्यारे दोस्तों आप इसी शौक के साथ मजलिस में शिर्कत करें ताकि बी 0 बी 0 फ़ात्मा जह़रा ( स अ ) इमाम हुसैन (अ स) और इमामे ज़माना (अ स) आप से ख़ुश रहें।